हिंदी भाषा का इतिहास
हिंदी को 14 सितंबर, 1949 को राजभाषा का दर्जा दिया गया था तथा संविधान के भाग-17 में इससे संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रावधान किए गए। 1953 से प्रतिवर्ष 14 सितंबर को 'हिंदी दिवस' का आयोजन किया जाता है।
हिंदी को 14 सितंबर, 1949 को राजभाषा का दर्जा दिया गया था तथा संविधान के भाग-17 में इससे संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रावधान किए गए। 1953 से प्रतिवर्ष 14 सितंबर को 'हिंदी दिवस' का आयोजन किया जाता है। हिंदी विश्व की सभी भाषाओं में सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा है क्योंकि इस जैसे बोला जाता वैसे ही लिखा जाता है । हिंदी के उच्चारण व लेखन में जितनी समानता है, उतनी किसी अन्य भाषा में नहीं। अंग्रेजी में कई शब्द silent होते हैं; जैसे know व knight, में k silent है, Psychology, Hustle में क्रमशः p और t silent हैं। परंतु हिंदी में स्पष्टता व सरलता है, जो इसे पूर्णतः एक वैज्ञानिक भाषा बनाती है।
हिंदी भाषा का इतिहास विद्वानों ने हिंदी भाषा का आरंभ प्रायः 12वीं शताब्दी से माना है तथा इस प्रकार इस भाषा का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना है। संस्कृत ----पालि- ----प्राकृत----अपभ्रंश ----- हिंदी हिंदी भाषा संस्कृत से ही निकली है जो भारत की सबसे प्राचीन भाषा है। संस्कृत को आर्य भाषा या देवभाषा भी कहा जाता है। वास्तव मे संस्कृत से ही हिंदी के अतिरिक्त मराठी, गुजरती, बंगला, उडिया असमिया, आदि भाषाएँ भी निकली हैं। भारत में संस्कृत भाषा 1500 ई॰पू॰ से 1000 ई॰ तक प्रचलित रही। बाद में यह भाषा दो भागों में विभाजित हुई — वैदिक एवं लौकिक। वेदों की रचना वैदिक काल में हुई थी। वैदिक संस्कृत में वेदों, उपनिषद इत्यादि का उल्लेख होता है। लौकिक संस्कृत में दर्शन ग्रंथों की रचना की गई है। इस भाषा में रामायण, महाभारत इत्यादि ग्रंथ लिखे गए। संस्कृत के बाद पालि भाषा का आगमन हुआ। पालि भाषा 500 ई॰पू॰से पहली शताब्दी तक रही और इस भाषा में मुख्य रूप से बौद्ध ग्रंथों की रचना हुई, इसलिए इसको बौद्ध त्रिपिटक की भाषा के रूप में भी जाना जाता है। पालि प्राचीनकाल में उत्तर भारतीय लोगों की भाषा थी जो पूर्व में बिहार से पश्चिम में राजस्थान व हरियाणा तक और उत्तर में नेपाल – उत्तर प्रदेश से दक्षिण में मध्य प्रदेश तक बोली जाती थी। पालि के पश्चात प्राकृत भाषा का उद्भव हुआ। यह प्रथम ईसवी से लेकर 500 ई तक प्रचलित रही। इस भाषा में जैन साहित्य की भी रचना की गई । पहली ईसवी तक यह बोलचाल की भाषा में बदल गई और इसे बोलचाल की प्राकृत भाषा की संज्ञा दी गई। कालांतर में प्राकृत भाषा परिवर्तित होकर अपभ्रंश बन गई। । अपभ्रश भाषा का काल 500 ईस्वी से 1000 ईस्वी माना जाता है । इस प्रकार, अपभ्रंश भारतीय आर्यभाषा के मध्यकाल की अंतिम अवस्था है जो भाषा विकास क्रम में प्राकृत और आधुनिक भाषाओं के बीच की स्थिति है। जहाँ अपभ्रंश भाषा के रचनाकारों द्वारा इस भाषा को केवल 'भाषा', ग्रामीण भाषा और 'देसी भाषा' कहा गया है, वहीं संस्कृत के विद्वानों ने इसके लिए 'अपभ्रष्ट' संज्ञा का प्रयोग किया गया है। उनका मानना है कि अपभ्रंश भाषा का बिगड़ा हुआ रूप है। भाषाविदों ने अपभ्रंश के निम्नलिखित सात भेद माने हैं और उससे निकली हुई आधुनिक भाषाओं को निम्न प्रकार से विभाजित किया है: i॰ शौरसैनी भाषा — पश्चिमी हिंदी (ब्रजभाषा, खड़ी बोली, बांगरू, कन्नौजी, बुंदेली), राजस्थानी (मेवाती, मारवाड़ी, मालवी, जयपुरी), गुजराती ii॰ अर्धमागधी — पूर्वी हिंदी (अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी) iii॰ मागधी — बिहारी (भोजपुरी, मैथिली, मगही), बंगला, उड़िया, असमिया iii॰खस — पहाड़ी हिंदी iv॰ पैशाची — लहंदा, पंजाबी v॰ ब्राचड़ — सिन्धी vi॰महाराष्ट्री — मराठी अतः स्पष्ट है कि हिंदी भाषा का उद्भव, अपभ्रंश के शौरसेनी, अर्धमागधी और मागधी रूपों से हुआ है। हिंदी की अनेक बोलियाँ या उपभाषाएँ भी हैं , जिनमें अवधी, ब्रजभाषा, कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, हड़ौती,भोजपुरी, हरयाणवी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, नागपुरी, खोरठा, कुमाउँनी,, मेवाती आदि प्रमुख हैं। इनमें से कई में अत्यन्त उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना हुई है । ऐसी बोलियों में ब्रजभाषा और अवधी प्रमुख हैं।
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